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27 February, 2013

गणेश चतुर्थी के प्राकृतिक प्रभाव


प्रकृति के बचाव के लिए सबसे उपयुक्त तरीकों को ढूंढने के लिए, यह आवश्यक है की, हम गणेश चतुर्थी के प्राकृतिक प्रभावों को ठीक तरह से समझे |
इन प्रभावों को निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है :-

• सबसे ज्यादा जल प्रदुषण, प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बनी मूर्तियों के विसर्जन से होता है |
• इन मूर्तियों में प्रयुक्त हुए रासायनिक रंगों से भी, जल प्रदुषण ज्यादा होता है |
• पूजा के दौरान हुआ ऐसा कचरा, जिसकी रीसाइकलिंग नही की जा सकती है, उससे भी जल प्रदुषण अधिक मात्रा में होता है |
• ध्वनि प्रदुषण |
• बढ़ते हुए उपभोक्ता |


जल प्रदुषण मुद्दा
पिछले कुछ सालो से, ये बात प्रकाश में आई है की, जल प्रदुषण सबसे ज्यादा प्लास्टर ऑफ़ पेरिस (पी.ओ.पी.) की बनी मूर्तियों (गणेश, दुर्गा) के विसर्जन से होता है | ये सभी मूर्तियाँ, झीलों, नदियों एवं समुद्रों में बहाई जाती है, जिससे जलीय वातावरण में समस्या सामने आती है | पी.ओ.पी. ऐसा पदार्थ है जो कभी समाप्त नही होता है, इससे वातावरण में प्रदुषण की मात्रा के बढ़ने की सम्भावना बहुत अधिक है | प्लास्टर ऑफ़ पेरिस, कैल्सियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट (CaSO4, 1/2 H2O) होता है, जो की जिप्सम (कैल्सियम सल्फेट डीहाइड्रेट) से बनता है | जबकि ईको फ्रेंडली मूर्तियाँ चिकनी मिट्टी से बनती हैं, जिन्हें विसर्जित करने पर वे आसानी से पानी में घूल जाती हैं | लेकिन जब इन्ही मूर्तियों को रासायनिक रंगों (भारी रासायनिक पदार्थों से मिलकर तैयार) से रंगा जाता है और फिर जब इन्हें विसर्जित किया जाता है, तो ये रंग पानी में घुलते है जो की जल प्रदुषण को बढ़ाते हैं |

मूर्तियों द्वारा होने वाले जल प्रदुषण के ऊपर बंगलुरु में किये गए अध्ययन से यहाँ पता चला है की:-
• पानी में उपलब्ध, अम्ल के प्रतिशत बढ़ रहे हैं |
• टोटल डिसौल्व सोलिड 100% तक बढ़ चुका है |
• मूर्तियों के विसर्जन के मौसम में, दिन में पानी में उपलब्ध आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है और रात में घट जाती है |

संभावित हल

चुकी मूर्ति विसर्जन, हमारी श्रद्धा, आस्था और भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए अब लोग इसके लिए कुछ सुझाव दे रहे हैं:-
1. सीधे झील, नदी या समुद्र में मूर्तियों का विसर्जन करने से अच्छा है की, हम उन्हें सरकार द्वारा बनाये गए बड़े - बड़े पानी की टंकियों में प्रवाह करे |
2. मूर्तियों को प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार किया जाए |
3. यदि संभव हो तो, मूर्तियों का उपयोग दुबारा किया जाये |
4. यदि कोई व्यक्ति, पी.ओ.पी सामग्रियों का प्रयोग कर रहा है तो, उसे पानी में प्रवाह करने की बजाय, उस पर पानी की 2 - 4 बुँदे सांकेतिक तौर पर प्रवाह के रूप में डाली जायें | इससे किसी की भावना को भी ठेस नही पहुचेगा और वातावरण भी सुरक्षित रहेगा | 

पूजा के फूलों का उचित प्रबंधन:-

नदियों में मूर्तियों के साथ अन्य कई सामग्रियां (फल, फूल, अगरबत्ती एवं पूजा के कपड़े) भी प्रवाहित किये जाते है | आजकल लोग थर्माकोल से बने मंदिर भी जल में प्रवाहित करते हैं |
पूना में, नगर निगम ने लोगों को ये समझाने की सफल कोशिश की है की, वो ये पदार्थ नदी या अन्य जगहों पर प्रवाहित न करें | इन सभी पदार्थों को प्रवाहित करने की बजाय कलश में रखें |

संभावित हल
1. नॉन बायोडीग्रेबल चीजों का प्रयोग न करे |
2. सभी बायोडीग्रेबल चीजों को कम्पोस्ट करें |
3. फलों को प्रवाहित करने के बजाय उन्हें गरीबों में दान करें |
4. फूलों को रीसायकल करके, उससे हस्त निर्मित कागज एवं अन्य उत्पाद बनाएं |

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